
बस दो घूँट पी लेने दे साकी
महफिल में जो आया हूँ,
अभी जली है ज्वाला दिल में
धूप-छाँव खेल कर आया हूँ,
मयखाने की मदहोशी छू लूँ
खुशियों को पहलू में भर लूँ,
बस दो घूँट पिला दे तो
इस पल को जी भर के जी लूँ,
इस दिल में जो दर्द छुपा है
उसे दिल में ही रह जाने दे,
बस एक घूँट पिला दे साकी
और मुझको मिट्टी में मिल जाने दे...
महफिल में जो आया हूँ,
अभी जली है ज्वाला दिल में
धूप-छाँव खेल कर आया हूँ,
मयखाने की मदहोशी छू लूँ
खुशियों को पहलू में भर लूँ,
बस दो घूँट पिला दे तो
इस पल को जी भर के जी लूँ,
इस दिल में जो दर्द छुपा है
उसे दिल में ही रह जाने दे,
बस एक घूँट पिला दे साकी
और मुझको मिट्टी में मिल जाने दे...
यह कविता मेरी ही है....
