Thursday, 27 December 2012

 मैं एक लड़की हूँ

"सुबह के उजले साए के संग,
धरती पर उतरी हूँ ऐसे,
कुछ कर जाने की चाहत मुझमें,
इतिहास बदलने का साहस मुझमें,
पर,
मैं फिर भी सहमी-सहमी सी रहती हूँ,
ख़ुद में ही सिमटी-सी मैं छुप-छुप कर जीती हूँ,
एक ख़ता बस मेरी इतनी,
कि मैं बस एक लड़की हूँ,
कि मैं बस एक लड़की हूँ।।"
निशांत

Tuesday, 26 June 2012

माही तू बहुत याद आएगी..


आँखों में चमकते सुनहरे से सपने,
और-
चेहरे पर छाई वो सुर्ख़ मासूमियत,
हमें कुछ सीखाने, हमें कुछ दिखाने,
आसमां से उतरी थी वो परी,
ज़िन्दगी के कुछ सपने सजाने,
ईश्वर की पूजा या ख़ुदा की वो नेमत,
आँगन में गूंजता वो निश्छल-सा बचपन,
पर-
हाय, जीवन-मृत्यु की ये कैसी है माया,
जिसमें बिखर गई वो मासूम सरगम,
'बोरवेल' की अंधेरी गहराईयों में,
एक और मीठी मुस्कान दफ़न हो गई,
जन्म-दिवस तो सौभाग्य ही लिखता,
फिर, तोहफ़े में क्यूँ मौत मिल गई,
जन्मदिन की ये अजब मृत्यु-गाथा,
इस बोझिल मन से कभी न मिट पायेगी,
दुनिया की रंग-बिरंगी चमक-दमक में भी,
'माही' तू बहुत याद आएगी..
'माही' तू बहुत याद आएगी..

निशान्त..

Wednesday, 22 February 2012

कुर्सी-वंदना..

                   (दोहा)
नौकरी हो या चाकरी, या हो राजनीति की बयार,
कुर्सी का ही खेल है सब, माँ कुर्सी की महिमा अपरम्पार..
                 (प्रार्थना)
जय, जय, जय हे कुर्सी माता,
नेताओं की हो भाग्य-विधाता,
सारे जग की तुम महारानी,
तुम्हारा और नहीं कोई सानी,
तुम्हारी दृष्टि जैसे दिवाकर,
नेताओं के करते भाग्य उजागर,
तुम्हारे आशीर्वाद को जो भी पावें,
सात पुश्त को बैठा कर खिलावें,
तुम्हारे हाथ जिस पर उठ जाते,
उसके तो तब दिन फिर जाते,
तुम्हारे गले में यह सुन्दर माला,
नेताजी कर बैठे घोटाला,
एक बार जब तुम हिल जाती,
सारे देश में आंधी चल जाती,
सबको तुम हो खूब सताती,
बड़ों-बड़ों को धूल चटाती,
तुम्हारे ख़ातिर तो हर दिग्गज डोले,
'कवि-केतु' भी अब जय-जय बोले,
तुम हो अद्भुत गुण की स्वामिनी,
कृपा करो हे कुर्सी महारानी..||
 
निशांत केतु..