Friday, 25 November 2011

एक थप्पड़ की गूँज इतनी क्यों..

कल केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को पड़ा ज़ोरदार थप्पड़ देर रात तक मीडिया की सुर्खियाँ बटोरता रहा. सियासी गलियारों से ले कर आम आदमी तक में सिर्फ इसी घटना चर्चा चलती रही और हर किसी की प्रतिक्रियाएं भी अपनी-अपनी तरह की थी. जहाँ तक सियासी दलों और उनके नेताओं की बात है तो, उम्मीद के मुताबिक़ सबने इस घटना की घोर निंदा की. थप्पड़ मारने वाले हरविंदर सिंह को सबने पागल करार दिया. लेकिन, न तो मैं हरविंदर की शख्सियत को लेकर हो रही बहस में पड़ना चाहता हूँ और ना ही इस घटना को जायज़ या नाजायज़ ठहराने मेरी कोई मंशा है. हाँ, कथित तौर पर भारतीय लोकतंत्र पर हुए इस हमले के बाद मुझे जो एक ख़ास चीज़ देखने को मिली, वो ये थी कि आमतौर पर एक-दूसरे की बखिया उधेड़ने की कोशिशों में लगे रहने वाले हमारे सभी महान नेता एकजुट नज़र आये. और इसमें भी विशेष बात तो ये रही कि मंगलवार से शुरू होने के बाद से ही लगातार हंगामे की भेंट चढ़ रहे संसद के शीतकालीन सत्र में पहली बार किसी मुद्दे पर शांति-पूर्वक चर्चा हो सकी. हाँ, ये अलग बात है कि ये चर्चा आम आदमी से जुड़े किसी मुद्दे पर नहीं हो रही थी. बल्कि, संसद के कीमती वक़्त में से तकरीबन 2 घंटे का समय सिर्फ़ एक थप्पड़ को समर्पित कर दिया गया. ऐसे में ना तो सत्ता पक्ष की नीयत पर विपक्ष ने कोई सवाल उठाया और ना ही विपक्ष की किसी बात पर सत्ता पक्ष को ही कोई ऐतराज़ था. पूरी चर्चा के दौरान हर माननीय सांसद ने अपने-आप को सच्चा देशभक्त और आम आदमी का मसीहा साबित करने की पूरी कोशिश की. कितना अजीब लगता है कि अक्सर ही आम आदमी से दूर-दूर रहने वाले हमारे प्रणब मुख़र्जी ऐसे मुद्दे पर आम जनता की बात करते हुए बहस की शुरुआत करते हैं और हैरानी विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज को सुन कर भी लगता है, जब वे पूरी तरह से उनका समर्थन करते हुए, इस थप्पड़ से जुड़े बाकि सभी पहलूओं को बड़ी आसानी से दरकिनार कर जाती हैं. ज़मीन से उठ कर जनता दल (यूनाईटेड) के अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुँचने वाले शरद यादव ने तो अपने पूरे भाषण में सिर्फ़ नेताओं को ही सच्चा देशभक्त साबित करने की कोशिश की. हाँ, मीडिया और मेरे जैसे मीडियाकर्मी तो उनकी निशाने पर पहले से ही रहते थे, अब तो आम जनता भी उनकी नज़र में विलेन बन गई है. इस पूरी बहस में सबने शरद पवार को बेहद शरीफ, सौम्य और साफ़-सुथरी छवि वाला जन-नेता करार दिया. लेकिन, सवाल ये उठता है कि जब किसी पार्टी का मुखिया इतना ही शरीफ और सौम्य प्रवृति का है तो, उस पार्टी के कार्यकर्ता इतने जूनूनी और उद्वेलित मानसिकता के क्यों हैं ? क्यों एक थप्पड़ का जवाब जगह-जगह जाम लगा कर, कई गाड़ियों को नुकसान पहुंचा कर और लाखों लोगों को परेशान करके दिया जा रहा है ? आख़िर, क्या वजह है कि एक सिरफिरे व्यक्ति के द्वारा चलाये गये थप्पड़ को इतना तूल दिया जा रहा है ? संसद द्वारा शांतिदूत घोषित कर दिए गये पवार साहब अपने कार्यकर्ताओं को रोकते क्यों नहीं ? या फिर, उनके ऊपर भी अब अपनी ताक़त का प्रदर्शन करने जूनून हावी होने लगा है ? ये तमाम प्रश्न ऐसे हैं, जो मेरे साथ-साथ कई दूसरे लोगों के दिमाग में भी हलचल पैदा कर रहे होंगे. मुझे तो हैरानी शिवसेना जैसी पार्टियों की प्रतिक्रियाएं देख कर भी होती है. मराठी अस्मिता के नाम पर अक्सर ही अपनी बददिमागी ताक़त का भौंडा प्रदर्शन करने वाली इस पार्टी ने भी पवार साहब पर हुए हमले की तीखी आलोचना की है और इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया है. मुझे समझ नहीं आता कि अगर इन राजनितिक पार्टियों को लोकतंत्र की इतनी ही चिंता है तो, वे आम जनता से जुड़े मसलों पर संसद के अन्दर एक सार्थक बहस क्यों नहीं होने देती ? पिछले 4 दिनों से लगातार ब्रेकडाउन में चल रहा संसद का शीतकालीन सत्र एक थप्पड़ पर तो, बहुत ही शान्ति-पूर्वक चर्चा करा लेता है. लेकिन, जन-हित की बात आते ही, लोकतंत्र के इस सबसे बड़े प्रतीक की बुनियाद हिलाने की कोशिश क्यों की जाती है ? एक-दूसरे को सच्चा हिन्दुस्तानी और महात्मा गाँधी का अनुयायी घोषित कर देने वाले हमारे नेता इस थप्पड़ के पीछे के कारणों को देखने की कोशिश क्यों नहीं करते ? सभी सियासी दल एक साथ बैठ कर इस बात पर चर्चा अवश्य करें कि पिछले 64 सालों से उनके कदमों तले रौंदी जा रही जनता के सब्र का बाँध अब क्यों टूटने लगा है ? जिस दिन हमारे नेता इस बात को समझ लेंगे, मुझे यक़ीन हैं कि एक दिन फिर वे राजनेता से जननेता बन जायेंगे और यही थप्पड़ और जूते मारने वाली जनता उन्हें सर आँखों पर बिठाएगी. हालांकि, फिलहाल राजनेताओं का जो रुख है उसमें तो मुझे इस बात की संभावना कम ही नज़र आती है. क्योंकि, भ्रष्टाचार और अभिमान के दलदल ने उनके सामने ऐसा अंधियारा बिखेर रखा है, जिसके आगे फैली रौशनी का तो शायद उन्हें आभास ही नहीं है. थोड़ा अजीब मीडिया के रुख को देख कर भी लगता है कि जिस मीडिया ने पवार साहब पर पड़े थप्पड़ और उसके बाद सड़क से लेकर संसद तक हुई चर्चा को पूरी तन्मयता के साथ प्रसारित किया, उसी मीडिया ने थप्पड़ पर हुई चर्चा के तुरंत बाद संसद की कारवाई को 28 नवम्बर तक स्थगित किये जाने के ख़बर को न्यूज़-मसाला बना कर पेश करने में दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई ? मेरी समझ से देशहित के मसलों पर संसद की करवाई में बाधा डालना और एक थप्पड़ पर पूरी संजीदगी से चर्चा करवाना, मीडिया के गलियारों में एक बड़ी ख़बर बन सकता था, जिसे भुनाने में ज़्यादातर न्यूज़ चैनल चूक गए. लिहाज़ा, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नागरिक होने के बावजूद आज मेरे मन में इस देश के लोकतान्त्रिक व्यवस्था को ले कर कई संदेह हैं. और, इस व्यवस्था में पिसते हुए बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि-
"श्री राम चन्द्र जी कह गये सिया से,
ऐसा कलयुग आएगा,
अन्ना रहेगा भूखा अक्सर,
और, कसाब बिरयानी खायेगा."
निशांत..

Wednesday, 16 November 2011

एक सिरफिरे वकील की कार्यशैली पर कोई आवाज़ क्यों नहीं उठती..

बात थोड़ी पुरानी है, लेकिन, मुझे महसूस हो रहा है कि ये आज के दौर में भी काफ़ी प्रासंगिक है. दरअसल, एक बार इस देश की स्थिति पर अपने एक परिचित से चर्चा करते वक़्त मुझे चुप कराने के लिए चंद पंक्तियाँ कही गयीं थी, जो कुछ इस तरह से है कि-
"मेरा कहना है कि मुज़रिमों को सज़ा दी जाये,
वरना, दीवार अदालत की गिरा दी जाये,
लेकिन, हममें से जो उभरता है वो बिक जाता है,
अगर, ये आलम है तो किस-किस को सज़ा दी.."
जी हाँ, ये चंद पंक्तियाँ कही तो तब गईं थी, लेकिन कल के अखबार में छपी एक ख़बर को देखते ही ये मुझे फिर से याद आ गयीं. ये ख़बर, जेसिका लाल हत्याकांड के मुख्य अभियुक्त मनु शर्मा से सम्बंधित थी, जिसमें उसने अपने भाई की शादी में शामिल होने के लिए अदालत से पेरोल पर रिहा किये जाने की गुहार लगाई है. अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें नया क्या है. ऐसे बहाने कर के जेल के बाहर की हवा खाने के कोशिश तो हर रसूखदार और शातिर अपराधी करता है, तो, फिर मनु शर्मा पर मुझे आपत्ति क्यों है? लेकिन, मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मेरी आपत्ति मनु शर्मा के अपील को ले कर नहीं है. मेरी आपत्ति उस महान वकील से है जो इस बेहूदा सी अपील को ले कर अदालत तक पहुँचा है. ये वो महान वकील हैं जो अक्सर ही ऐसे मुज़रिमों का केस लेकर अदालत में जाते दिख जायेंगे, जो आमतौर पर समाज के लिए ख़तरा हैं. अब शायद आपलोगों को अंदाज़ा लग ही गया होगा कि मैं इस देश के काबिल वकीलों में से एक राम जेठमलानी के बारे में बात कर रहा हूँ. हाल के दिनों में कई शातिर और खतरनाक अपराधियों को जेल से बाहर निकालने की मुहीम में बड़ी शिद्दत के साथ जुटे जेठमलानी जी का इस बार का लक्ष्य जेसिका लाल हत्याकांड में उम्रकैद की सज़ा भुगत रहे मनु शर्मा को किसी भी सूरत में जेल से बाहर निकालने की है. यही वजह है की अदालत में इस केस की सुनवाई के दौरान जब जज ने कुछ आपत्तियां जताईं, तो, जेठमलानी साहब ने उन आपत्तियों को कानूनी पेचीदगियों के मकड़जाल में उलझाने की पूरी कोशिश की. दरअसल, अदालत का सवाल उस घटना को लेकर था, जब मनु शर्मा पिछली बार पेरोल पर रिहा किये जाने के बाद 5 सितारा होटलों  में पार्टियाँ करते देखा गया था. उस वक़्त उसने जेल से बाहर आने के लिए दादी की बीमारी और कुछ व्यावसायिक कार्यों को पूरा करने की दलील रखी थी. लेकिन, उसके बाद उसे होटलों में पार्टियाँ करते और डांस-क्लब में ऐश करते हुए देखा गया था. ये बात भी सामने नहीं आती, अगर कुछ संजीदा लोगों की निगाहें उस पर नहीं पड़ती. लेकिन, अदालत की इस आपत्ति पर जेठमलानी जी की ये दलील है कि तमाम व्यावसायिक मुलाकातें होटलों में ही होती हैं और उनके मुवक्किल ने ये पार्टियाँ इन मुलाकातों के दौरान ही किया. उनकी दलील ये भी है कि पेरोल पर रिहा हो कर पार्टियाँ करना और डांस-क्लब में जा कर ऐश करना कोई गुनाह नहीं है. उनकी दलील ये भी रही कि किसी को भी पेरोल पर रिहा किये जाने के लिए सिर्फ पिछले एक साल का रिकॉर्ड देखा जाता है और मनु शर्मा का रिकॉर्ड इस दौरान बेहतर रहा है. बेशक, जेठमलानी साहब की ये दलीलें अपनी जगह पर सही हैं, लेकिन, क्या उनकी अंतरात्मा कभी उनको नहीं झकझोरती? आख़िर ऐसे क्यों है कि एक ही वकील कभी मुंबई अंडरवर्ल्ड से सम्बन्ध रखने वाले लोगों की पैरवी करता है, तो, कभी आतंकवादी गतिविधियों में आरोपी व्यक्ति के लिए कानून की पेचीदगियों के साथ खेलता दिख जाता है. हाल ही में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गाँधी के हत्यारों को भी फांसी के फंदे से बचाने का बीड़ा उठाया है और इस दिशा में की गयी अपनी पहली कोशिश में वे मनु शर्मा के केस की तरह ही सफल भी हो गए हैं. लेकिन, इस हाई-प्रोफाइल वकील साहब कि आवाज़ भोपाल गैस काण्ड के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए क्यों नहीं उठती? ये ठीक है कि किसी भी वकील को अपने केस और मुवक्किल चुनने का पूरा अधिकार है. लेकिन, क्या इस अधिकार का प्रयोग सिर्फ देश और समाज के दुश्मनों की पैरवी के लिए ही किया जा सकता है. क्या एक महान वकील बनने की पात्रता बस इतनी ही है कि केवल नकारात्मक मामलों की ही पैरवी की जाए? इस समाज में न जाने कितने ही ऐसे लोग हैं जो वर्षों से इन्साफ पाने के इंतज़ार में दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं. कई ऐसे मामले आज भी अदालत की फाइलों में दबे पड़े हैं जिनकी पैरवी करके जेठमलानी जी जैसा काबिल वकील इस समाज का काफी भला कर सकता है. लेकिन, शायद ऐसा नहीं होगा? क्योंकि हमारे इर्द-गिर्द ऐसे लोगों की ही भरमार है जो महान बनने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. फिर उनकी कोशिशों से समाज और देश पर क्या असर पड़ता है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं और मेरे ख्याल में जेठमलानी जी भी ऐसे ही लोगों का ही शायद एक प्रतिबिम्ब हैं.. बाकि आपकी क्या राय है ये आप मुझे ज़रूर बताएं.

Thursday, 18 August 2011

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है..

(भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अन्ना हज़ारे ने जो आन्दोलन शुरू किया है,
उसे आम जनता का जो अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा है और इसके 
बावजूद जिस तरह से डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने अड़ियल रवैया
अपना रखा है, उसे देखते हुए मुझे रामधारी सिंह दिनकर की एक 
कविता याद आती है, जो मैं आपके लिए भी पेश कर रहा हूँ.. उम्मीद है 
इस कविता  के ज़रिये व्यक्त की गयी  भावानाएं एक न एक दिन 
सत्ता के नशे में चूर  राजनेताओं तक ज़रूर  पहुंचेगी..)

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

जनता?हां,लंबी - बडी जीभ की वही कसम,
"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।"
"सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?"
'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?"

मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता;गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं;
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।
फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

Friday, 8 July 2011

मृत्यु का वरदान..

जीवन जो दिया तूने मुझको दाता,
तो, जीवन का कुछ राग सुना दे,
अनंत रहस्यों को मैं भी समझूँ,
ऐसा तो कोई दीप जला दे,
सृष्टि को ज्योतिर्मय करने वाली,
तेरी वो लौ अलौकिक क्यों है ?
प्राणदायी भी गर तू ही है,
तो, जीवन को तू हरता क्यों है ?
सब मानव जब हैं एक समान,
तो, सुख-दुःख कैसे बाँटे जाते हैं ?
जो नियम बनाए तूने इस धरती के,
वो, मन का भेद क्यों न मिटाते हैं ?
मजहब अगर प्यार ही सिखाता है,
तो, क्यों दी जाती है कुर्बानी इंसानों की ?
हर मूरत को जो तूने ही ढ़ाला है,
तो, क्यों आती फ़ितरत ये हैवानों की ?
जात-समाज की इन झूठी बेड़ियों में,
क्यों, मानवता बिलखती रह जाती है ?
जो सारी शक्ति तुझसे ही है,
तो, ये तुझको ही कैसे बेबस कर जाती है ?
हे सर्वशक्तिमान, हे दानी कृपाल,
अम्बर तक फैला तेरा ये कैसा मायाजाल ?
इस माया, मृग-मरीचिका से,
प्रभु, तुम्हारा भी कुछ मेल है क्या ?
कुछ ऐसा ज्ञान मुझे भी दे दो भगवन,
जो समझूँ कि-
जीवन का ये खेल है क्या ?
अंश मात्र मैं भी हूँ तुम्हारा ही,
मुझको भी अपना कुछ तो भेद बता दो,
वरना, वापस ले लो इस जीवन को,
और-
मुझे मृत्यु का ही वरदान दिला दो..
मुझे मृत्यु का ही वरदान दिला दो..

निशांत..

Sunday, 8 May 2011

सैलरी की व्यथा..

(प्रस्तुत की जा रही मेरी ये कविता सैलरी नहीं बढ़ने की वजह से मन में उठने वाली व्यथा का सिर्फ़ एक आईना भर है और ये किसी भी तरह से किसी भी व्यक्ति विशेष के ख़िलाफ़ नहीं है. मेरा इरादा किसी का अपमान करने का भी नहीं है. इसीलिए मेरे चक्र में फँसने वाले सभी सज्जनों से अनुरोध है कि वो इसका ग़लत तरीक़े से प्रसार न करें और सिर्फ़ इसका  आनंद  लें. आपके सहयोग से ही मेरी बेबाक़ कवितायें जारी रह सकती हैं.)

साहब जी ओ साहब जी, सैलरी कब बढ़ाओगे,
इस बार आएगी कुछ अच्छी ख़बर,
या, मेरी अर्ज़ी को एक बार फिर टाल ही जाओगे.
कशमकश में कटती रातें,
सपनों को वो तकती आँखें,
इन आँखों के सपनों को,
जब घर में लेकर जाता हूँ,
तो, मत पूछो किन हालातों में मैं ख़ुद को उलझा पाता हूँ.
बीवी चढ़ती छाती पर,
नई साड़ी की मांग वो करती है,
तानों के तीखे तीरों के संग ही,
अब, हर फ़रमाईश का बोझ  वो धरती है,
बच्चे भी सब मिलकर के शोर मचाया करते हैं,
मेरे बोझिल मन पर वो-
आइसक्रीम, खिलौनों का बोझ बढ़ाया करते हैं.
मालिक मकान भी देख मुझे, कुछ खिचड़ी मन में पकाता है,
उसके किराए के चढ़ते पारे पर दिल मेरा टूटा जाता है,
ग्वाले-बनिए कि मैं क्या अकड़ बताऊँ,
मिलावटी-उधारी खा कर कैसे,
मैं बिलखते मन की क्या व्यथा सुनाऊँ.
अब आप ही बताओ इन हालातों में,
कैसे मैं अपने सपनों को गुलज़ार करूँ,
खींच-तान की इस सैलरी पर,
किस-किस से मैं इकरार करूँ,
मेरी आँखों के सपनों को रौशनी की एक राह दिखाओ,
बढ़ती महंगाई का ही कुछ तो अब आप भरम जगाओ.
मेरी व्यथा ग़र आप समझ गए तो,
'कवि केतु' का कुछ तो कल्याण करो,
सैलरी नहीं बढ़ा सकते तो-
महीने के आख़िरी हफ़्ते में क़र्ज़ का ही कुछ इंतजाम करो.
थोड़ा आप करोगे भी तो एक नया उत्साह जगाओगे,
बोलो ना-
साहब जी, सैलरी कब बढाओगे..??
बोलो ना-
साहब जी, सैलरी कब बढाओगे..??

निशांत केतु..

Thursday, 5 May 2011

ओसामा की मौत पर एक जेहादी का दर्द..


आतंक की राह में देखो अब दोस्त भी बेगाने हो गए,
हमको अनाथ बना कर ओसामा जी कहाँ तुम चले गए,
वो शानो-शौकत की ज़िन्दगी को ठोकरें मार कर,
लादेन, जो तुम चल पड़े खौफ़ और दहशत की राह पर,
हर रूह आज भी कांपती है बस तुम्हारे नाम से,
पहचान बनाई है दुनिया में तुमने अपने इंतकाम से,
जेहाद की उन मीठी यादों को पल भर में तोड़ गए,
हमको अनाथ बना कर ओसामा जी कहाँ तुम चले गए..
वो वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की बुलंदियों को मिट्टी में मिला दिया,
अमेरिका के गिरेबान को एक झटके में तुमने हिला दिया,
वो ख़ुदकुश हमलों में जो हर रोज़ बिखर रही है ज़िन्दगी,
लादेन तुम्हारे नाम में ही अब झलकती है दरिंदगी,
अल-क़ायदा के क़ायदों को क्या अब तुम ही भूल गए,
हमको अनाथ बना कर ओसामा जी कहाँ तुम चले गए..
वो एके-47 की गोलियां जो बरसती थी दुश्मनों पर,
तुम्हारा ही पाठ पढ़ कर हम चलते रहे राहे मौत पर,
बोलो, तुम्हारे बाद अब हमारा अंजाम क्या रहेगा,
दहशत ही ग़र मज़हब है तो इसका ठेकेदार कौन बनेगा,
सवाल हज़ारों छोड़ कर ख़ुद तुम ही बेवफ़ाई कर गए,
हमको अनाथ बना कर ओसामा जी कहाँ तुम चले गए..
सोचते थे तुम्हारी राहों पर चल कर जो हम फ़ना हो जायेंगे,
तो, जन्नत ही होगी नसीब में या फ़रिश्ते हम कहलायेंगे,
पर, जब तुम्हारे ही मुक़द्दर में जो दो गज ज़मीं नहीं रही,
फिर हम कैसे कहें कि दहशत की ये राह है सही,
शायद यही सोच कर 'कवि केतु' भी जेहाद से दूर हो गए,
हमको अनाथ बना कर ओसामा जी कहाँ तुम चले गए..
हमको अनाथ बना कर ओसामा जी कहाँ तुम चले गए..

निशांत केतु.....

Friday, 25 February 2011

दिल्ली की सड़कों का एक आम अनुभव..

दिल्ली की सड़कों पर सफ़र करते समय हमें चाहे-अनचाहे कई तरह के अनुभवों से दो-चार होना पड़ता है.  बीती रात अपने एक मित्र के साथ ऑफिस से घर जाते समय रास्ते में मैं भी एक ऐसे ही दृश्य से दो-चार हुआ और मेरा मोबाइल कैमरा इस दृश्य को अपने लेंस में क़ैद करने के लिए उद्वेलित हो उठा और मैं भी फिर अपने-आप को रोक नहीं सका और चलती बाईक से ही एक के बाद एक कुछ तस्वीरें ले कर अपने मन को और मोबाइल कैमरे की उद्वेलना को शांत किया. फिलहाल ये तसवीरें मेरे इस चक्र में विचरण करने वालों के लिए भी प्रस्तुत हैं..