जीवन जो दिया तूने मुझको दाता,
तो, जीवन का कुछ राग सुना दे,
अनंत रहस्यों को मैं भी समझूँ,
ऐसा तो कोई दीप जला दे,
सृष्टि को ज्योतिर्मय करने वाली,
तेरी वो लौ अलौकिक क्यों है ?
प्राणदायी भी गर तू ही है,
तो, जीवन को तू हरता क्यों है ?
सब मानव जब हैं एक समान,
तो, सुख-दुःख कैसे बाँटे जाते हैं ?
जो नियम बनाए तूने इस धरती के,
वो, मन का भेद क्यों न मिटाते हैं ?
मजहब अगर प्यार ही सिखाता है,
तो, क्यों दी जाती है कुर्बानी इंसानों की ?
हर मूरत को जो तूने ही ढ़ाला है,
तो, क्यों आती फ़ितरत ये हैवानों की ?
जात-समाज की इन झूठी बेड़ियों में,
क्यों, मानवता बिलखती रह जाती है ?
जो सारी शक्ति तुझसे ही है,
तो, ये तुझको ही कैसे बेबस कर जाती है ?
हे सर्वशक्तिमान, हे दानी कृपाल,
अम्बर तक फैला तेरा ये कैसा मायाजाल ?
इस माया, मृग-मरीचिका से,
प्रभु, तुम्हारा भी कुछ मेल है क्या ?
कुछ ऐसा ज्ञान मुझे भी दे दो भगवन,
जो समझूँ कि-
जीवन का ये खेल है क्या ?
अंश मात्र मैं भी हूँ तुम्हारा ही,
मुझको भी अपना कुछ तो भेद बता दो,
वरना, वापस ले लो इस जीवन को,
और-
मुझे मृत्यु का ही वरदान दिला दो..
मुझे मृत्यु का ही वरदान दिला दो..
निशांत..
Friday, 8 July 2011
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