Tuesday, 17 November 2009

लौट के बुद्धू घर को आए..







हाथी की मस्त चाल देख, मुलायम गए बौराय,
पंचर साइकिल के संग घूमे, हवा भरो न जाए।
बहू हारी फिरोजाबाद, तो गुस्से में नोचें खम्भा,
छोटे भईया संग मिलकर, कल्याण से ले लिया पंगा।
कल्याण से ले लिया पंगा॥
आगे न चलियो संग मेरे, सुन लो ऐ कल्याण,
मुलायम ने कह दी ऐसी वाणी, सुनकर सब हैरान।
समाजवादी का चोला ओढ़े, मुलायम हुए कठोर,
वोट की खातिर दोस्त से ही, फेर लियो मुंह किसी ओर।
फेर लियो मुंह किसी ओर॥
देख मौकापरस्ती मुलायम की, सख्त भय कल्याण,
पूरे दम-ख़म से ताल ठोक, किया बदले का ऐलान।
समाजवाद की साइकिल तोड़, करूँ हाथी की चाल खस्ता,
पंजे की काट न पूछो मुझसे, सूझे न कोई और रस्ता।
सूझे न कोई और रस्ता॥
रामलला की शरण में, आया है फिर से बूढा शेर,
गाड़ी चले मेरी मन्दिर से ही, सियासत का है ये फेर।
कमल पर ही बलिहारी जाऊं, बस करत यही विचार,
कभी दोस्त तो कभी दुश्मन, राजनीति की महिमा है अपरम्पार।
राजनीति की महिमा है अपरम्पार॥
देख मुलायम-कल्याण की दशा, सर मेरा चकराए,
लोटपोट हो सोचन लगे, 'निशांत' महा कविराय।
काहे फंस गए इस लोचे में, राजनीति का यही है फंडा
बुद्धू लौटे घर को अब तो, बड़ा बेआबरू करे ये हिट धंधा।

निशांत..

Monday, 2 November 2009

प्रधानमंत्री जी, हमें इच्छा-मृत्यु का अधिकार दीजिये..

बदलते दौर में एक खुशहाल हिंदुस्तान का ख़्वाब देखने वाले मेरे दोस्तों। एक बार फ़िर अपने ब्लॉग पर आपका तहेदिल से स्वागत करते हुए, अपने दिल की बात आपके सामने रख रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ कि मेरे दिल का दर्द कहीं-न-कहीं आपको भी सोचने पर मजबूर करेगा। इसीलिए, आपसे गुजारिश है कि मेरी इस अर्जी को न सिर्फ़ प्रधानमंत्री तक, बल्कि, देश की राजनीति से जुडे हर शख्स तक पहुँचाने में मेरी मदद करें।


आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
आपकी मंगलकामना करते हुए केन्द्र में आपकी सरकार के बिना उठा-पटक के चलने पर आपको बधाई देता हूँ। आप जिस मेहनत, ईमानदारी और रणनीति के साथ अब तक सरकार चलाते आए हैं, वह वाकई काबिलेतारीफ है। कहा जा सकता है कि आम आदमी को साथ लेकर सरकार चलाने की इससे बेहतर मिसाल कहीं नही मिल सकती। यही वजह है कि मैं और मेरे जैसे वो लोग जिन्होंने कभी भी किसी नेता के सामने अपनी झोली नही फैलाई, जिन्होंने सिर्फ मेहनत करके पेट पालने को ही अपना मुक़द्दर समझा है, अपनी झोली फैला कर आपसे सिर्फ़ एक चीज़ माँगना चाहते हैं। प्रधानमंत्री जी, कृपया हमें इच्छा-मृत्यु का हक़ दे दीजिये। अब, आप सोच रहे होंगे कि देश के दूसरे सबसे महवपूर्ण और राजनीति में सबसे ईमानदार छवि रखने वाले व्यक्ति से ये कैसी मांग है। प्रधानमंत्री जी, दरअसल ये मांग हमारी उस मजबूरी से उठी है, जिसने हमारे जिंदा रहने कि चाहत को ख़त्म कर दिया है। सामान्य तौर पर हमें आम आदमी का नाम दिया जाता है। ये, आम आदमी रोज़ सुबह इस उम्मीद के साथ अपने रोज़गार पर निकलता है कि शाम को जब घर लौटेगा तो अपने पूरे परिवार का पेट भर सकेगा। उनकी ज़्यादा बड़ी नही तो छोटी-मोटी ज़रूरतों को ज़रूर पूरा कर सकेगा। इस आम आदमी में वो किसान भी शामिल है जो अपने खेतों में अनाज तो पैदा करता है, लेकिन, उस अनाज से कभी भी वह अपना और अपने बच्चों का पेट नही भर पाता। अमीर को और ज़्यादा अमीर तथा ग़रीब को और ज़्यादा ग़रीब बनाने कि सरकार की पॉलिसी ने हमसे हमारी जीने की चाह ही छीन ली है। प्रधानमंत्री जी, अर्थशास्त्र की दुनिया में तो आपको काफी मज़बूत खिलाड़ी के तौर पर जाना जाता है। इसके अलावा, आपकी सरकार में शामिल कई मंत्री भी देश-विदेश में अपनी प्रतिभा के लिए पहचाने जाते हैं। फ़िर आख़िर बढ़ती महंगाई पर आपकी सरकार लगाम क्यूँ नही लगा पा रही है। वर्ष २००४ में बीजेपी के कथित कुशासन से निजात पा कर आपकी सरकार बनने के बाद से ही आम आदमी की थाली से पहले दाल गायब हो गई, उसके बाद आपकी सरकार के रणनीतिकारों की नज़र सब्जी पर पड़ गई। बाकि चाय के कप की चीनी तो पहले ही कड़वी हो चुकी थी, और अब तो दूध भी गायब होता जा रहा है। चलिए वहाँ तक भी ठीक था। हम तो अब इन कोशिशों में लगें हैं कि हमारे बच्चे भी भूखे रहने की आदत डालना सीख लें। प्रधानमंत्री जी, इन परिस्थियों में एक-दो वक्त भूखे रह कर भी हम यही कहते कि आपकी सरकार का, आपकी पार्टी यानि कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ ही है। लेकिन, क्या आपकी सरकार के पास इसका जवाब है कि आख़िर तमाम पैकेज देने के बावजूद भी देश के किसान आत्महत्या करने को क्यों मजबूर हो रहे हैं। आख़िर आपकी सरकार अपने इन किसानों में जीने की ललक क्यों नही पैदा कर पा रही। चलिए हम इस गम को भी जी कर आपकी सरकार के उस प्रयास का गुणगान ही करेंगे, जो विदेशों में हमारे देश की अच्छी छवि पेश करने के लिए किए जा रहे हैं। हाँ, इसके लिए बेशक देश की आधी से ज़्यादा जनता बेबसी की ज़िन्दगी जीने को मजबूर हो। महंगाई की मार झेल रहा आम आदमी तो फिर भी भूख और अभाव से लड़ना सीख चुका है। लेकिन, हम रोजी-रोटी की तलाश में सुबह जब घर से निकलते हैं तो शाम को हम घर वापस लौट कर आयेंगे या नही इसकी गारंटी किसी के पास नही है। कभी हमें दहशतगर्द निशाना बनाते हैं, तो कहीं नक्सलियों ने हमारा रास्ता रोक रखा है। हमारे परिवार के सदस्य एक अनजाने से भय के साये में ज़िन्दगी जीने को मजबूर हैं। ऐसे में अब आप ही बताईये कि कब तब हम यूँ ही तिल-तिल कर मरते रहे, आख़िर हम कैसे कहे कि हमारा भारत महान है। लेकिन, इन सबके बावजूद आत्महत्या कर हम कानून की नज़रों में ख़ुद को गुनाहगार नही बनाना चाहते, न ही हम आपकी सरकार को दोषी ठहराना चाहते हैं। प्रधानमंत्री जी हमें आपसे कुछ नही चाहिए, बस हमें इच्छामृत्यु का अधिकार दे दीजिये, ताकि अब तक बे-गैरत की ज़िन्दगी जी रहा आम आदमी कम से कम गैरत की मौत तो मर सकेगा। आप यकीन मानिये, हम तो मरते-मरते भी बस यही कह जायेंगे कि आपकी सरकार का हाथ, आपकी पार्टी 'कांग्रेस' का हाथ आम आदमी के साथ ही है।
धन्यवाद॥
आपकी मंगलकामना में
आपका अपना आम आदमी.

Sunday, 25 October 2009

मिश्रा जी का ब्लॉग और मेरी प्रतिक्रिया..

ब्लॉग उपग्रह के मेरे सभी दोस्तों को आपके इस दोस्त का एक बार फ़िर जय हिंद। ज़िन्दगी के सफर में और रोज़गार में महारथ दिखाने की होड़ के कारण काफ़ी दिनों के बाद इस लोक में मेरा आना हो पाया है। हालाँकि, मुझे पता है कि आप लोगों ने मुझे ज़्यादा मिस नही किया होगा, फ़िर भी माफ़ी चाहूँगा। हाँ, ज़िन्दगी के इस भाग-दौड़ के बीच मुझे गूगल की ईमेल सेवा के ज़रिये मिश्रा जी का ब्लॉग पढ़ने का गर्व हासिल होता रहता है, जो हर हफ्ते या फ़िर हफ्ते में २ बार ज़रूर ही मेरे इन्बोक्स में आकर टिमटिमाता रहता है। अब आप सोच रहे होंगे की मेरी इन बेबाक बातों में कौन से मिश्रा जी आ गए। अरे भाईलोगों मिश्रा जी रोज़गार के क्षेत्र में मेरे सहयात्री, मेरे सीनियर और कहीं-न-कहीं मेरे मार्गदर्शक भी हैं। हाँ, आपलोगों की जानकारी के लिए इतना बता दूँ की मिश्रा जी इस उपग्रह का नियमित रूप से भ्रमण करते हैं और अपने बेबाक अंदाज़ से आम जनमानस को अवगत भी कराते रहते हैं। जहाँ तक मुझे याद है ब्लॉग के इस मज़बूत खिलाड़ी को इस उपग्रह पर आने का ख़्याल शायद साल २००७ में आया था। तब से लेकर आज तक मिश्रा जी अपने तरकश 'विनोद मिश्रा का ब्लॉग' और 'बकवास रिपोर्ट' के माध्यम से न जाने कितने ही पहलूओं को खंगालने की कोशिश कर चुके हैं। एक तरफ़ जहाँ इसमें आमजन की बातें हैं तो सरकारी पॉलिसी पर कभी सहमति तो कभी काफी ज़ोरदार अंदाज़ में मुखालफत भी है। मिश्रा जी अपने ब्लॉग के माध्यम से उन समस्याओं पर भी चोट करने में जुटे हुए हैं जो इस पूरे मुल्क के लिए चुनौती बनी हुई हैं। लेकिन सियासी मामलों पर मिश्रा जी के ख्यालात अक्सर मेरे सवालों का जवाब नही दे पाये हैं। इसकी एक वजह शायद मेरा दक्षिणपंथी जमातों से शुरू से ही तालुक़्क़ात रखना भी हो सकता है। ऐसे में कई बार मेरी कोशिश होती है कि मैं मिश्रा जी को अपने ख्यालातों कि तरफ़ मोड़ सकूं। लेकिन, मेरी कोशिशें मिश्रा जी को आजतक दक्षिणपंथ कि तरफ़ मोड़ नही पायीं हैं। हालांकि, सरकारी पॉलिसी पर उनकी कई दलील आपको भी ज़रूर सोचने पर मजबूर करेंगी। लेकिन, मेरे जो यक्ष प्रश्न आज भी मिश्रा जी के सामने घूम रहे हैं उनका जवाब मुझे कब मिलेगा। इसीलिए, इस उपग्रह के सभी वासियों से मेरा अनुरोध है कि मिश्रा जी के मोहल्ले में ज़रूर भ्रमण करें और उनके ख्यालातों पर अपनी बात भी रखें। हो सकता है कि सियासी विकल्प ढूँढने के मेरे सवालों के जवाब शायद आपके ख्यालों में ही निकल आयें। नही तो फ़िर हमसब मिल कर कम से कम मिश्रा जी पर इस बात का दबाव तो बना ही पाएंगे कि ब्लॉग लिखने के साथ-साथ या तो हमारे सवालों का जवाब भी ढूंढें, नही तो दक्षिणपंथ विचारधारा में ही शामिल हो जाएँ। ब्लॉग उपग्रह के आप सभी प्राणियों की सहूलियत के लिए मैं आपको मिश्रा जी के ब्लॉग का लिंक भी दे रहा हूँ। तो ब्लॉग की दुनिया के मेरे महारथी साथियों एक बार मेरी तरफ़ से दिए जा रहे इस लिंक पर क्लिक कीजिये और मिश्रा जी के द्वारा लिखी जानेवाली पांडुलिपियों पर अपनी बेबाक राय दीजिये।
धन्यवाद॥

Wednesday, 19 August 2009

किताब के फेर में..






बी जे पी के हनुमान ने छोड़ा ऐसा तुक्का,

राम-लक्ष्मन की जोड़ी को कर दिया हक्का-बक्का,

जिन्ना पर उमड़े प्रेम से खफा भयो राम परिवार,

कैसे इससे पल्ला झाड़े, बस करत यही विचार।

बस करत यही विचार॥

शिमला में चिंतन कर निकाल्यो एक समाधान,

बोले सब एक स्वर में गुडबाय हनुमान,

पार्टी से छुट्टी कर अब बी जे पी खड़ी आर एस एस के द्वार,

जिन्ना के भूत से उबारो मोहे सरकार।

उबारो मोहे सरकार॥

कभी आडवाणी तो कभी जसवंत, करे मुफलिसी में आंटा गिला,

सर-फुटव्वल खेले नेता, बाकि सब ढीला-ढीला,

शार्टकट के फोर्मुले से सब पीसे अपनी चक्की,

हाईकमान कुछ समझ न पाये, जनता भी हक्की-बक्की।

जनता भी हक्की-बक्की॥

किताब के फेर में उलझ कर बुरे फंसे जसवंत,

बड़े बेआबरू हो घर से निकले- समय होत बलवंत,

बुक लिखन के चक्कर में अब न पडियों रे 'निशांत',

सबसे अच्छा बेगार ही है, बचे तो अपना मान॥

निशांत केतु..

Tuesday, 10 March 2009

मेरी तन्हाई...

काफ़ी दिनों बाद ब्लॉग लिखने का समय मिल पाया है। दरअसल, आप यूँ समझे कि आज की इस भागती-दौड़ती दुनिया में रम कर मैं शायद अपने-आपको और अपने अस्तित्व को ही भूल गया था। शायद मैं इस दुनिया को ही अपना परिवार, अपना घर, अपना सबकुछ समझने लगा था। लेकिन, शायद ये अहसास आज के दौर में होना ही ग़लत है। इस भागती-दौड़ती ज़िन्दगी में मैंने, आपने, हम सब ने कई मुकाम बनाये होंगे। लेकिन, एक बार पीछे मुड कर अपने ज़िन्दगी के खोये पन्ने को सहेजते वक्त कई ख्याल दिलो-दिमाग पर छा कर मन को भारी कर देते हैं... और बार-बार बस एक ही ख्याल दिल में आता है...
मेरी तन्हाई ढूँढती है जिसको,
वो तो एक अल्हड़ मस्त हवा है,
जो सारी चिंताओं से मुक्त,
घूमती है इस शहर में यहाँ-वहां,
और मेरी बेचैन चाहत का,
पता भी नही है उसको।
उसको देखा था जब मैंने पहली बार,
तो ऐसा लगा था जैसे ज़िन्दगी मिल गई,
पर आज देखता हूँ जब ख़ुद को,
तो पता हूँ-
उस मस्त हवा के संग-संग,
मेरी ज़िन्दगी भी मुझसे रूठ कर चली गई।
अब तन्हा ज़िन्दगी को तन्हाई का ही सहारा है,
बिन इसके तो कुछ भी नही ज़िन्दगी में,
इसीलिए तो इस दिल ने भी,
दिल से उसे ही पुकारा है।
अब दिल कभी नही ढूंढेगा उस मस्त हवा को,
न चाहत होगी किसी खुशी कि, न ग़म होगा किसी बेवफाई का,
तन्हाई की हर अदा ही मोहब्बत की हमसफ़र बन जायेगी,
ज़िन्दगी तो बड़ी बेवफा निकली,
तन्हाई ही अब वफ़ा निभाएगी...
निशांत...