


हाथी की मस्त चाल देख, मुलायम गए बौराय,
पंचर साइकिल के संग घूमे, हवा भरो न जाए।
बहू हारी फिरोजाबाद, तो गुस्से में नोचें खम्भा,
छोटे भईया संग मिलकर, कल्याण से ले लिया पंगा।
कल्याण से ले लिया पंगा॥
आगे न चलियो संग मेरे, सुन लो ऐ कल्याण,
मुलायम ने कह दी ऐसी वाणी, सुनकर सब हैरान।
समाजवादी का चोला ओढ़े, मुलायम हुए कठोर,
वोट की खातिर दोस्त से ही, फेर लियो मुंह किसी ओर।
फेर लियो मुंह किसी ओर॥
देख मौकापरस्ती मुलायम की, सख्त भय कल्याण,
पूरे दम-ख़म से ताल ठोक, किया बदले का ऐलान।
समाजवाद की साइकिल तोड़, करूँ हाथी की चाल खस्ता,
पंजे की काट न पूछो मुझसे, सूझे न कोई और रस्ता।
सूझे न कोई और रस्ता॥
रामलला की शरण में, आया है फिर से बूढा शेर,
गाड़ी चले मेरी मन्दिर से ही, सियासत का है ये फेर।
कमल पर ही बलिहारी जाऊं, बस करत यही विचार,
कभी दोस्त तो कभी दुश्मन, राजनीति की महिमा है अपरम्पार।
राजनीति की महिमा है अपरम्पार॥
देख मुलायम-कल्याण की दशा, सर मेरा चकराए,
लोटपोट हो सोचन लगे, 'निशांत' महा कविराय।
काहे फंस गए इस लोचे में, राजनीति का यही है फंडा
बुद्धू लौटे घर को अब तो, बड़ा बेआबरू करे ये हिट धंधा।
निशांत..




