Tuesday, 7 December 2010

कुछ और तस्वीरें गाँव की..

तस्वीरों के माध्यम से गाँव की कुछ यादों को सहेजने का मुझे एक और मौक़ा मिला, जिसे मैं अपने चक्र में फँसने वाले सभी मुसाफिरों के सामने एक बार फिर प्रस्तुत कर रहा हूँ..
                     (ऐसा तांगा वाला देखा है कभी..??)

                     (और अब तांगा चलाने की तैयारी..)

                     (गाँव का साप्ताहिक बाज़ार..)

           (साप्ताहिक बाज़ार की एक अलग ही रौनक होती है..)

      (इस बाज़ार में फल, सब्जी, अनाज कुछ भी खरीद सकते हैं..)

             (साथ में चाय-नाश्ते का भी पूरा इंतजाम रहता है..)

Monday, 18 October 2010

गाँव कि सड़क..

गाँव कि सड़क का मुसाफिर..

गाँव का मंदिर..

गाँव का बाज़ार..

गाँव का सोना.. बोले तो गाँव का खेत..

गाँव का एक रंग ये भी है..
ये कुछ तस्वीरें हैं जो मेरे गाँव की, या फिर हम सब के देश की एक रंग-बिरंगी छवि पेश करती है, और इसीलिए मुझे लगा कि इन तस्वीरों को आपके इस ब्लॉग के ज़रिये आपके साथ भी बांटा जा सकता है. मुझे उम्मीद है कि ये तस्वीरें आपको भी पसंद आएँगी..
गाँव कि सुबह..

Tuesday, 28 September 2010

लता ताई के जन्मदिन पर चंद पंक्तियाँ..



संगीत के तरन्नुम में लिपटी एक शोख़ आवाज़ जब उनके लबों से निकलती है,
               
एक सुकून का एहसास देकर, वो रूह तक उतरती है,

सुरीली आवाज़-वो-अंदाज़ का एक जादू कहीं अनंत तक गूँज रहा है,

संगीत को भी नाज़ है खुद पर, जब सारा गुलिस्तां ही लता ताई के सुरों से महक रहा है..

स्वर-कोकिला को जन्मदिन की ढेरों बधाई..
निशांत..

Monday, 20 September 2010

आख़िरी मुसाफिर..


मैं मंज़िलों का आख़िरी मुसाफिर,
टूटे सपनों को भी जीता हूँ,
हमसफ़र नहीं है कोई मेरा,
पर, एक आस लिए मैं चलता हूँ
जीवन के उबड़-खाबड़ पथ पर,
दुनिया तो हर पल भेष बदलती है,
अपनों की ही महफ़िल में,
पांचाली चीरहरण का दर्द सहती है,
पर, मैं इन रस्मों में जी कर भी,
एक उम्मीद को रौशन करता हूँ
मैं मंज़िलों का आख़िरी मुसाफिर,
टूटे सपनों को भी जीता हूँ
हमक़दम, हमनवां की चाहत में,
न जाने कितने दिल टूटा करते हैं,
साहिल पर ही आकर अक्सर,
सब अपने छूटा करते हैं,
पर, दुनिया के बेगानेपन पर भी मैं,
सब रंग जमाए चलता हूँ
मैं मंज़िलों का आख़िरी मुसाफिर,
टूटे सपनों को भी जीता हूँ
सब जाने हैं कि एक डोर है जीवन,
फिर, क्यों भागम-भाग मची,
इंसानों की अंधी बस्ती में,
कहीं सेज सजी, तो, कहीं चिता जली,
जीवन के इन गहरे अंधियारों में भी,
मैं एक राह दिखाए चलता हूँ
मैं मंज़िलों का आख़िरी मुसाफिर,
टूटे सपनों को भी जीता हूँ
आधी ज़िन्दगी, अधूरे सपनों में जीवन एक खिलौना है,
कहीं मखमली एहसास तो, कहीं धरती ही बिछौना है,
किस्मत के ऐसे ठोकर खा कर भी,
वक़्त के थपेड़ो से टकरा कर भी,
मैं सब दर्दे-दिल छुपाये चलता हूँ
मैं मंज़िलों का आख़िरी मुसाफिर,
टूटे सपनों को भी जीता हूँ
मैं मंज़िलों का आख़िरी मुसाफिर,
टूटे सपनों को भी जीता हूँ


निशांत..