
मैं मंज़िलों का आख़िरी मुसाफिर,
टूटे सपनों को भी जीता हूँ,
हमसफ़र नहीं है कोई मेरा,
पर, एक आस लिए मैं चलता हूँ
जीवन के उबड़-खाबड़ पथ पर,
दुनिया तो हर पल भेष बदलती है,
अपनों की ही महफ़िल में,
पांचाली चीरहरण का दर्द सहती है,
पर, मैं इन रस्मों में जी कर भी,
एक उम्मीद को रौशन करता हूँ
मैं मंज़िलों का आख़िरी मुसाफिर,
टूटे सपनों को भी जीता हूँ
हमक़दम, हमनवां की चाहत में,
न जाने कितने दिल टूटा करते हैं,
साहिल पर ही आकर अक्सर,
सब अपने छूटा करते हैं,
पर, दुनिया के बेगानेपन पर भी मैं,
सब रंग जमाए चलता हूँ
मैं मंज़िलों का आख़िरी मुसाफिर,
टूटे सपनों को भी जीता हूँ
सब जाने हैं कि एक डोर है जीवन,
फिर, क्यों भागम-भाग मची,
इंसानों की अंधी बस्ती में,
कहीं सेज सजी, तो, कहीं चिता जली,
जीवन के इन गहरे अंधियारों में भी,
मैं एक राह दिखाए चलता हूँ
मैं मंज़िलों का आख़िरी मुसाफिर,
टूटे सपनों को भी जीता हूँ
आधी ज़िन्दगी, अधूरे सपनों में जीवन एक खिलौना है,
कहीं मखमली एहसास तो, कहीं धरती ही बिछौना है,
किस्मत के ऐसे ठोकर खा कर भी,
वक़्त के थपेड़ो से टकरा कर भी,
मैं सब दर्दे-दिल छुपाये चलता हूँ
मैं मंज़िलों का आख़िरी मुसाफिर,
टूटे सपनों को भी जीता हूँ
मैं मंज़िलों का आख़िरी मुसाफिर,
टूटे सपनों को भी जीता हूँ
निशांत..

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