Sunday, 8 May 2011

सैलरी की व्यथा..

(प्रस्तुत की जा रही मेरी ये कविता सैलरी नहीं बढ़ने की वजह से मन में उठने वाली व्यथा का सिर्फ़ एक आईना भर है और ये किसी भी तरह से किसी भी व्यक्ति विशेष के ख़िलाफ़ नहीं है. मेरा इरादा किसी का अपमान करने का भी नहीं है. इसीलिए मेरे चक्र में फँसने वाले सभी सज्जनों से अनुरोध है कि वो इसका ग़लत तरीक़े से प्रसार न करें और सिर्फ़ इसका  आनंद  लें. आपके सहयोग से ही मेरी बेबाक़ कवितायें जारी रह सकती हैं.)

साहब जी ओ साहब जी, सैलरी कब बढ़ाओगे,
इस बार आएगी कुछ अच्छी ख़बर,
या, मेरी अर्ज़ी को एक बार फिर टाल ही जाओगे.
कशमकश में कटती रातें,
सपनों को वो तकती आँखें,
इन आँखों के सपनों को,
जब घर में लेकर जाता हूँ,
तो, मत पूछो किन हालातों में मैं ख़ुद को उलझा पाता हूँ.
बीवी चढ़ती छाती पर,
नई साड़ी की मांग वो करती है,
तानों के तीखे तीरों के संग ही,
अब, हर फ़रमाईश का बोझ  वो धरती है,
बच्चे भी सब मिलकर के शोर मचाया करते हैं,
मेरे बोझिल मन पर वो-
आइसक्रीम, खिलौनों का बोझ बढ़ाया करते हैं.
मालिक मकान भी देख मुझे, कुछ खिचड़ी मन में पकाता है,
उसके किराए के चढ़ते पारे पर दिल मेरा टूटा जाता है,
ग्वाले-बनिए कि मैं क्या अकड़ बताऊँ,
मिलावटी-उधारी खा कर कैसे,
मैं बिलखते मन की क्या व्यथा सुनाऊँ.
अब आप ही बताओ इन हालातों में,
कैसे मैं अपने सपनों को गुलज़ार करूँ,
खींच-तान की इस सैलरी पर,
किस-किस से मैं इकरार करूँ,
मेरी आँखों के सपनों को रौशनी की एक राह दिखाओ,
बढ़ती महंगाई का ही कुछ तो अब आप भरम जगाओ.
मेरी व्यथा ग़र आप समझ गए तो,
'कवि केतु' का कुछ तो कल्याण करो,
सैलरी नहीं बढ़ा सकते तो-
महीने के आख़िरी हफ़्ते में क़र्ज़ का ही कुछ इंतजाम करो.
थोड़ा आप करोगे भी तो एक नया उत्साह जगाओगे,
बोलो ना-
साहब जी, सैलरी कब बढाओगे..??
बोलो ना-
साहब जी, सैलरी कब बढाओगे..??

निशांत केतु..

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