Friday, 25 November 2011

एक थप्पड़ की गूँज इतनी क्यों..

कल केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को पड़ा ज़ोरदार थप्पड़ देर रात तक मीडिया की सुर्खियाँ बटोरता रहा. सियासी गलियारों से ले कर आम आदमी तक में सिर्फ इसी घटना चर्चा चलती रही और हर किसी की प्रतिक्रियाएं भी अपनी-अपनी तरह की थी. जहाँ तक सियासी दलों और उनके नेताओं की बात है तो, उम्मीद के मुताबिक़ सबने इस घटना की घोर निंदा की. थप्पड़ मारने वाले हरविंदर सिंह को सबने पागल करार दिया. लेकिन, न तो मैं हरविंदर की शख्सियत को लेकर हो रही बहस में पड़ना चाहता हूँ और ना ही इस घटना को जायज़ या नाजायज़ ठहराने मेरी कोई मंशा है. हाँ, कथित तौर पर भारतीय लोकतंत्र पर हुए इस हमले के बाद मुझे जो एक ख़ास चीज़ देखने को मिली, वो ये थी कि आमतौर पर एक-दूसरे की बखिया उधेड़ने की कोशिशों में लगे रहने वाले हमारे सभी महान नेता एकजुट नज़र आये. और इसमें भी विशेष बात तो ये रही कि मंगलवार से शुरू होने के बाद से ही लगातार हंगामे की भेंट चढ़ रहे संसद के शीतकालीन सत्र में पहली बार किसी मुद्दे पर शांति-पूर्वक चर्चा हो सकी. हाँ, ये अलग बात है कि ये चर्चा आम आदमी से जुड़े किसी मुद्दे पर नहीं हो रही थी. बल्कि, संसद के कीमती वक़्त में से तकरीबन 2 घंटे का समय सिर्फ़ एक थप्पड़ को समर्पित कर दिया गया. ऐसे में ना तो सत्ता पक्ष की नीयत पर विपक्ष ने कोई सवाल उठाया और ना ही विपक्ष की किसी बात पर सत्ता पक्ष को ही कोई ऐतराज़ था. पूरी चर्चा के दौरान हर माननीय सांसद ने अपने-आप को सच्चा देशभक्त और आम आदमी का मसीहा साबित करने की पूरी कोशिश की. कितना अजीब लगता है कि अक्सर ही आम आदमी से दूर-दूर रहने वाले हमारे प्रणब मुख़र्जी ऐसे मुद्दे पर आम जनता की बात करते हुए बहस की शुरुआत करते हैं और हैरानी विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज को सुन कर भी लगता है, जब वे पूरी तरह से उनका समर्थन करते हुए, इस थप्पड़ से जुड़े बाकि सभी पहलूओं को बड़ी आसानी से दरकिनार कर जाती हैं. ज़मीन से उठ कर जनता दल (यूनाईटेड) के अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुँचने वाले शरद यादव ने तो अपने पूरे भाषण में सिर्फ़ नेताओं को ही सच्चा देशभक्त साबित करने की कोशिश की. हाँ, मीडिया और मेरे जैसे मीडियाकर्मी तो उनकी निशाने पर पहले से ही रहते थे, अब तो आम जनता भी उनकी नज़र में विलेन बन गई है. इस पूरी बहस में सबने शरद पवार को बेहद शरीफ, सौम्य और साफ़-सुथरी छवि वाला जन-नेता करार दिया. लेकिन, सवाल ये उठता है कि जब किसी पार्टी का मुखिया इतना ही शरीफ और सौम्य प्रवृति का है तो, उस पार्टी के कार्यकर्ता इतने जूनूनी और उद्वेलित मानसिकता के क्यों हैं ? क्यों एक थप्पड़ का जवाब जगह-जगह जाम लगा कर, कई गाड़ियों को नुकसान पहुंचा कर और लाखों लोगों को परेशान करके दिया जा रहा है ? आख़िर, क्या वजह है कि एक सिरफिरे व्यक्ति के द्वारा चलाये गये थप्पड़ को इतना तूल दिया जा रहा है ? संसद द्वारा शांतिदूत घोषित कर दिए गये पवार साहब अपने कार्यकर्ताओं को रोकते क्यों नहीं ? या फिर, उनके ऊपर भी अब अपनी ताक़त का प्रदर्शन करने जूनून हावी होने लगा है ? ये तमाम प्रश्न ऐसे हैं, जो मेरे साथ-साथ कई दूसरे लोगों के दिमाग में भी हलचल पैदा कर रहे होंगे. मुझे तो हैरानी शिवसेना जैसी पार्टियों की प्रतिक्रियाएं देख कर भी होती है. मराठी अस्मिता के नाम पर अक्सर ही अपनी बददिमागी ताक़त का भौंडा प्रदर्शन करने वाली इस पार्टी ने भी पवार साहब पर हुए हमले की तीखी आलोचना की है और इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया है. मुझे समझ नहीं आता कि अगर इन राजनितिक पार्टियों को लोकतंत्र की इतनी ही चिंता है तो, वे आम जनता से जुड़े मसलों पर संसद के अन्दर एक सार्थक बहस क्यों नहीं होने देती ? पिछले 4 दिनों से लगातार ब्रेकडाउन में चल रहा संसद का शीतकालीन सत्र एक थप्पड़ पर तो, बहुत ही शान्ति-पूर्वक चर्चा करा लेता है. लेकिन, जन-हित की बात आते ही, लोकतंत्र के इस सबसे बड़े प्रतीक की बुनियाद हिलाने की कोशिश क्यों की जाती है ? एक-दूसरे को सच्चा हिन्दुस्तानी और महात्मा गाँधी का अनुयायी घोषित कर देने वाले हमारे नेता इस थप्पड़ के पीछे के कारणों को देखने की कोशिश क्यों नहीं करते ? सभी सियासी दल एक साथ बैठ कर इस बात पर चर्चा अवश्य करें कि पिछले 64 सालों से उनके कदमों तले रौंदी जा रही जनता के सब्र का बाँध अब क्यों टूटने लगा है ? जिस दिन हमारे नेता इस बात को समझ लेंगे, मुझे यक़ीन हैं कि एक दिन फिर वे राजनेता से जननेता बन जायेंगे और यही थप्पड़ और जूते मारने वाली जनता उन्हें सर आँखों पर बिठाएगी. हालांकि, फिलहाल राजनेताओं का जो रुख है उसमें तो मुझे इस बात की संभावना कम ही नज़र आती है. क्योंकि, भ्रष्टाचार और अभिमान के दलदल ने उनके सामने ऐसा अंधियारा बिखेर रखा है, जिसके आगे फैली रौशनी का तो शायद उन्हें आभास ही नहीं है. थोड़ा अजीब मीडिया के रुख को देख कर भी लगता है कि जिस मीडिया ने पवार साहब पर पड़े थप्पड़ और उसके बाद सड़क से लेकर संसद तक हुई चर्चा को पूरी तन्मयता के साथ प्रसारित किया, उसी मीडिया ने थप्पड़ पर हुई चर्चा के तुरंत बाद संसद की कारवाई को 28 नवम्बर तक स्थगित किये जाने के ख़बर को न्यूज़-मसाला बना कर पेश करने में दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई ? मेरी समझ से देशहित के मसलों पर संसद की करवाई में बाधा डालना और एक थप्पड़ पर पूरी संजीदगी से चर्चा करवाना, मीडिया के गलियारों में एक बड़ी ख़बर बन सकता था, जिसे भुनाने में ज़्यादातर न्यूज़ चैनल चूक गए. लिहाज़ा, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नागरिक होने के बावजूद आज मेरे मन में इस देश के लोकतान्त्रिक व्यवस्था को ले कर कई संदेह हैं. और, इस व्यवस्था में पिसते हुए बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि-
"श्री राम चन्द्र जी कह गये सिया से,
ऐसा कलयुग आएगा,
अन्ना रहेगा भूखा अक्सर,
और, कसाब बिरयानी खायेगा."
निशांत..

No comments: