नौकरी हो या चाकरी, या हो राजनीति की बयार,
कुर्सी का ही खेल है सब, माँ कुर्सी की महिमा अपरम्पार..
(प्रार्थना)
जय, जय, जय हे कुर्सी माता,
नेताओं की हो भाग्य-विधाता,
सारे जग की तुम महारानी,
तुम्हारा और नहीं कोई सानी,
तुम्हारी दृष्टि जैसे दिवाकर,
नेताओं के करते भाग्य उजागर,
तुम्हारे आशीर्वाद को जो भी पावें,
सात पुश्त को बैठा कर खिलावें,
तुम्हारे हाथ जिस पर उठ जाते,
उसके तो तब दिन फिर जाते,
तुम्हारे गले में यह सुन्दर माला,
नेताजी कर बैठे घोटाला,
एक बार जब तुम हिल जाती,
सारे देश में आंधी चल जाती,
सबको तुम हो खूब सताती,
बड़ों-बड़ों को धूल चटाती,
तुम्हारे ख़ातिर तो हर दिग्गज डोले,
'कवि-केतु' भी अब जय-जय बोले,
तुम हो अद्भुत गुण की स्वामिनी,
कृपा करो हे कुर्सी महारानी..||
निशांत केतु..


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