आँखों में पलते ख्वाबों की ताबीर नही देनेवाले,
जन्नत का गुमां हो जिसपर वो जागीर नही देनेवाले,
तुम सुलह करो या जंग करो मर्ज़ी तुम्हारी जो भी करो,
हम जान तो दे सकते हैं, मगर कश्मीर नही देनेवाले...
(दोस्त ने सुनाया है..)
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