Saturday, 23 August 2008

सियासत के जानवर

पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के खिलाफ जारी हिंसा और इसके पीछे चल रही सियासत ने अब दिल को कचोटना शुरू कर दिया है। हर रोज़ सुबह ये सोचकर अखबार उठाता हूँ कि आज शायद कुछ अच्छी ख़बर पढ़ने को मिल जाए। लेकिन एक ताज़ी सुबह में रंग-बिरंगे अखबार को पहला पन्ना पलटते ही मेरे दिल कि ये हसरत टूटे माला की मोतियों की तरह पल भर में बिखर जाती है। हर रोज़ की तरह एक बार फिर वही आम उत्तर भारतीयों या यूँ कहूँ कि आम भारतीय की वही दो पाटों की सियासत में पिसती दास्ताँ पढ़-पढ़कर मेरे जैसे आम हिन्दुस्तानी के दिलों में एक टीस सी उठने लगती है। दिल में कुछ ऐसा गुबार उठता है जो आखों का आँसू बनकर बाहर आने को बेताब हो जाता है। लेकिन, एक आदमी की हैसियत और अपने सामाजिक ताने-बाने का ख्याल आते ही इन आंसूओं को खून की घूँट की तरह पी जाता हूँ। कई बार सियासत के इस पहलू के तह में पहुँचने की कोशिश भी की। अपने दोस्तों और समाज के निर्माताओं से काफी लम्बी बहस के बाद कुछ हद तक एक नतीजे पर पहुँचा हूँ.. दरअसल, अब हिंदुस्तान की सियासत में एक ट्रेंड लगातार ज़ोर पकड़ने लगा है... और ये ट्रेंड है उत्तर भारतीयों, खासतौर से बिहारिओं को गाली देने का। ये वो ट्रेंड है जिसके ज़रीये कई गैर उत्तर भारतीय या गैर उत्तर बिहारी नेताओं को सत्ता की आसान सीढ़ी दिखाई देती है। इन नेताओं की सत्ता लोलुपता इतनी बढ़ गई है कि इनके दिमाग से सही-ग़लत या ऊँच-नीच का फर्क भी पूरी तरह से मिट गया है। ये ट्रेंड ख़तरे के निशान से कितना ऊपर पहुँच गया है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता कि शिवसेना के शुरुआती दिनों में बाल ठाकरे का वोट बैंक बनाने की खातिर शुरू किया गया भड़काऊ भाषणों का सिलसिला अब समाज को बांटने की हद तक जा पहुँचा है। बाल ठाकरे की तर्ज़ पर ही उनके भतीजे राज ठाकरे भी अब अपनी ज़मीन बनाने की जुगत में लगे हैं। समाज को बांटने के अपने चाचा के भड़काऊ अंदाज़ की विरासत को राज अपनी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ पूरी शिद्दत के साथ सँभालने में लगे हैं। लेकिन, मराठी मानुष के इस नए ठेकेदार की ये दम्भी कोशिश अब एक सभ्य समाज के लिये नासूर बनती जा रही है। महाराष्ट्र की सत्ता पर कब्ज़ा ज़माने के सपने देख रहे इस जोशीले युवक ने न सिर्फ़ महाराष्ट्र और यूपी-बिहार को जलते अंगारों पर चलने के लिए मजबूर कर दिया है, बल्कि १२५ करोड़ की आबादी वाले पूरे हिंदुस्तान में भी एक बेचैनी की लहर पैदा कर दी है। हालाँकि, मराठी मानुष के इस नए पहरुवे को एक सभ्य समाज तो कभी तव्वजोह नही देता, लेकिन इसे मीडिया की खास कवरेज़ ज़रूर मिल रही है। कैमरे के लगातार चमकते फ्लैशों की आदत डाल चुके इस खास से भी खास बने मराठी सेनापति को विदर्भ में लगातार आत्महत्या करते किसानो की बेबस आवाज़ तो कभी भी सुनाई नही देती, लेकिन, महाराष्ट्र में मेहनत-मजदूरी कर अपना पेट पाल रहे अवाम का घर उजाड़ना ज़रूर याद रहता है। सत्ता की भूख और मीडिया कवरेज़ की चाहत में ठाकरे परिवार के इस स्मार्ट शख्सियत को इंसानी खून और पानी में भी फर्क नज़र नही आता। उसे यह भी नज़र नही आता कि मराठी अवाम के हक की खातिर बुलंद किए जा रहे उसके तथाकथित आन्दोलन में महाराष्ट्र भी उतना ही जल रहा है, जितना की बिहार और यूपी। सार्वजानिक संपत्तियों को निशाना बनाने की वजह से दिक्कतें मराठी जनता ही झेल रही हैं। लेकिन, सफ़ेद पहनावे में लाल तिलक लगाने वाला ये युवक शायद सत्ता की दौड़ अपने चाचा को पछाड़ना चाहता है। लेकिन, शिवाजी के नाम की सियासत खेलने वाले ये क्यूँ भूल जाते हैं कि छत्रपति शिवाजी ने सिर्फ़ महाराष्ट्र के लिए नही, बल्कि, पूरे हिंदुस्तान के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा दी। धर्म, भाषा और जातीय आधार पर मुल्क को बाँटने की बात करनेवालों को शायद वीर सावरकर और लोकमान्य की देशभक्ति का तनिक भी ज्ञान नही। ये रही इन मराठी मानुषों की बात। लेकिन, ठाकरे के 'राज'द्रोह पर दूसरी सियासी पार्टियों का रुख भी मेरे जैसे आम हिन्दुस्तानी को हैरान कर देता है। इस 'राज'द्रोह पर कांग्रेस की चुप्पी तो इसलिए भी समझ में आती है कि इस सियासी पार्टी ने तो आजतक गरीब अवाम की कोई कद्र ही नही की। इमर्जेंसी और सिख दंगे के गुनाहगारों को सर पर बिठाना शायद इसका खास शगल है। बाकि बीजेपी भी शायद कर्णाटक और गुजरात फतह कर लेने के बाद अब मदमस्त हो चुकी है, या फिर उसे महाराष्ट्र में अपनी बची-खुची ज़मीन खो देने का डर सता रहा है। लेकिन, बिहार के हक की खातिर अपनी जान की भी कुर्बानी देने की बात करने वाले लालू यादव, बिहारियों को पूरी दुनिया में इज्ज़त दिलाने की बात करनेवाले नीतिश कुमार और सामाजिक न्याय की बात करनेवाले रामविलास पासवान और मायावती की नींदें महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के गूंडों द्वारा निशाना बनाये जा रहे उत्तर भारतीयों की सिसकियों से खुलती क्यों नही ? क्या सिर्फ़ बयानबाजी कर देने भर से ही इनकी राजनीतिक जिम्मेदारियाँ ख़त्म हो जाती हैं ? शायद नही... लेकिन हमारे समाज के इन ठेकेदारों को इसकी कोई परवाह नही। गलती हमारे जैसे आम हिन्दुस्तानियों की भी है, जो ख़ुद कोई पहल करने के बजाय इन्हीं पहरुओं के भरोसे बैठे रहते हैं। लेकिन हमे ये याद करना होगा कि इस युग में न तो राम पैदा होते हैं, न ही कृष्ण.. इस युग में समाज को सँभालने वाला कोई पैगम्बर या ईशा मसीह भी पैदा नही होता । इस युग में तो सिर्फ़ रावण और भस्मासुर ही पैदा हो सकते हैं, जिनका उद्देश्य सिर्फ़ अपना और अपने समाज का नुकसान करना होता है। शायद यही हमारे पहल कि ज़रूरत है। हमें इन सामाजिक ठेकेदारों के बहकावे में आने के बजाय ख़ुद पर भरोसा करना सीखना होगा वरना हमारी एक छोटी सी भूल २१वी सदी में दुनिया का लीडर बनने के सपने देख रहे १२५ करोड़ की आबादी वाले हिंदुस्तान के १२५ करोड़ टुकड़े कर सकता है।

7 comments:

Satyendra PS said...

बड़े शर्म की बात है कि राज ठाकरे, बाल ठाकरे जैसे निकृष्ठ लोग हमारे देश में हैं। मैंने पहली बार बाल ठाकरे के बारे में तब सुना था, जब इन्होंने राम मंदिर मुद्दे पर तमाम बयान दिया था। उस समय ये हिंदू थे। अभी अचानक साध्वी के मसले पर भी बाल ठाकरे अचानक हिंदू बन गए। एक ही देश में रहते हैं, भारत मां की धरती पर ही सांस लेते हैं और इतनी गंदी राजनीति करते हैं कि शर्म भी शरमा जाए। अपने स्वार्थ में कभी मराठी बन जाते हैं, कभी हिंदू बन जाते हैं। शायद ईसाई संगठनों से मुंहमांगी कीमत मिले तो ये ईसाई बनने से भी परहेज नहीं करेंगे और मराठियों की भी पिटाई शुरू कर देंगे ईसाई बनाने के लिए। इनके लिए भगवान का कोई मतलब नहीं है, पूजा से कोई मतलब नहीं है, भगवान को भी मराठी बाबा और यूपी बाबा, बिहार के भगवान आदि नामों में बांट रखा है। गरीब लोगों को मंदिर के नाम पर मरवा कर राजनीति चमकानी हो तो ये उन्हें हिंदू घोषित कर देते है। अगर उनको हक देने की बात आए तो उन्हें नीच बताते हैं। ऐसी राजनीति पर सबको थूकना ही चाहिए। ये अलग बात है कि यूपी-बिहार के नेता अपने प्रदेश के लोगों के लिए कुछ खास नहीं कर पाते, इसलिए वे गाली के पात्र तो हैं ही। अपनी जिम्मेदारियों से वे नहीं बच सकते।

P.N. Subramanian said...

बहुत ही सुंदर विश्लेशण. इतनी जल्दी स्थितियाँ सुधारने वाली नहीं दिखतीं. आभार.
कृपा कर वर्ड वेरिफिकेशन का प्रावधान हटा दें. इस से कोई खास फ़ायदा नहीं है.
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Nishant Ketu said...

Styendra Ji aur Subramanian Uncle ka mere lekh par rai dene ke liye bahut bahut shukriya...
Umeed hai aage bhi apka margdarshan mujhe milta rahega...
Thanx Again...

nishit said...

jehn ko jhakjhorne wali ati uttam prastuti. agar raj thackeray marathi maanoos hai, to shivaji aur lokmanyatilak marathi kabhi nahi ho sakte.

vaishali said...

bahut accha hai aapne bahut achha likha hai nishant jee
Amit Kumar

महेंद्र मिश्र.... said...

Bahut badhiya abhivyakti. dhanyawad.

मुनीश ( munish ) said...

sahi baat hai! i agree with vaishali totally.