काफ़ी दिनों बाद ब्लॉग लिखने का समय मिल पाया है। दरअसल, आप यूँ समझे कि आज की इस भागती-दौड़ती दुनिया में रम कर मैं शायद अपने-आपको और अपने अस्तित्व को ही भूल गया था। शायद मैं इस दुनिया को ही अपना परिवार, अपना घर, अपना सबकुछ समझने लगा था। लेकिन, शायद ये अहसास आज के दौर में होना ही ग़लत है। इस भागती-दौड़ती ज़िन्दगी में मैंने, आपने, हम सब ने कई मुकाम बनाये होंगे। लेकिन, एक बार पीछे मुड कर अपने ज़िन्दगी के खोये पन्ने को सहेजते वक्त कई ख्याल दिलो-दिमाग पर छा कर मन को भारी कर देते हैं... और बार-बार बस एक ही ख्याल दिल में आता है...
मेरी तन्हाई ढूँढती है जिसको,
वो तो एक अल्हड़ मस्त हवा है,
जो सारी चिंताओं से मुक्त,
घूमती है इस शहर में यहाँ-वहां,
और मेरी बेचैन चाहत का,
पता भी नही है उसको।
उसको देखा था जब मैंने पहली बार,
तो ऐसा लगा था जैसे ज़िन्दगी मिल गई,
पर आज देखता हूँ जब ख़ुद को,
तो पता हूँ-
उस मस्त हवा के संग-संग,
मेरी ज़िन्दगी भी मुझसे रूठ कर चली गई।
अब तन्हा ज़िन्दगी को तन्हाई का ही सहारा है,
बिन इसके तो कुछ भी नही ज़िन्दगी में,
इसीलिए तो इस दिल ने भी,
दिल से उसे ही पुकारा है।
अब दिल कभी नही ढूंढेगा उस मस्त हवा को,
न चाहत होगी किसी खुशी कि, न ग़म होगा किसी बेवफाई का,
तन्हाई की हर अदा ही मोहब्बत की हमसफ़र बन जायेगी,
ज़िन्दगी तो बड़ी बेवफा निकली,
तन्हाई ही अब वफ़ा निभाएगी...
निशांत...


4 comments:
रंग और गुलाल का पर्व होली पर आपको मेरी तरफ से रंगीन बधाई । मस्ती से मनाइये होली पर्व
निशांत जी
ब्लॉग उपग्रह पर आने की बधाई। अच्छी रचना सुनाई...
bahut achhi lagi rachana badhai
u should come here more often ! nice meeting u here. i agree with mehek totally!
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