Wednesday, 19 August 2009

किताब के फेर में..






बी जे पी के हनुमान ने छोड़ा ऐसा तुक्का,

राम-लक्ष्मन की जोड़ी को कर दिया हक्का-बक्का,

जिन्ना पर उमड़े प्रेम से खफा भयो राम परिवार,

कैसे इससे पल्ला झाड़े, बस करत यही विचार।

बस करत यही विचार॥

शिमला में चिंतन कर निकाल्यो एक समाधान,

बोले सब एक स्वर में गुडबाय हनुमान,

पार्टी से छुट्टी कर अब बी जे पी खड़ी आर एस एस के द्वार,

जिन्ना के भूत से उबारो मोहे सरकार।

उबारो मोहे सरकार॥

कभी आडवाणी तो कभी जसवंत, करे मुफलिसी में आंटा गिला,

सर-फुटव्वल खेले नेता, बाकि सब ढीला-ढीला,

शार्टकट के फोर्मुले से सब पीसे अपनी चक्की,

हाईकमान कुछ समझ न पाये, जनता भी हक्की-बक्की।

जनता भी हक्की-बक्की॥

किताब के फेर में उलझ कर बुरे फंसे जसवंत,

बड़े बेआबरू हो घर से निकले- समय होत बलवंत,

बुक लिखन के चक्कर में अब न पडियों रे 'निशांत',

सबसे अच्छा बेगार ही है, बचे तो अपना मान॥

निशांत केतु..

1 comment:

Fauziya Reyaz said...

bahut khoob nishant ji...kaafi achhi aur mazedaar rachna hai