ये कुछ तस्वीरें हैं जो मेरे गाँव की, या फिर हम सब के देश की एक रंग-बिरंगी छवि पेश करती है, और इसीलिए मुझे लगा कि इन तस्वीरों को आपके इस ब्लॉग के ज़रिये आपके साथ भी बांटा जा सकता है. मुझे उम्मीद है कि ये तस्वीरें आपको भी पसंद आएँगी..
केतु का ये चक्र जिंदादिल लोगों की जिन्दादिली दिखाने का सबसे अच्छा माध्यम है... अगर आप भी जिंदादिल हैं तो इस चक्र का हिस्सा बने... आपका तहेदिल से स्वागत है...
वैधानिक चेतावनी...
हमारे चक्र में आनेवाले मज़मून कोई ज़रूरी नही है कि उस्तादों के अपने हों। यहाँ आनेवाले दोस्तों से अनुरोध है कि वे इसे अपने जैसे ही बिंदास टाईप उस्ताद के द्वारा पढा-पढाया या सुना-सुनाया भी माने... बोले तो एकदम बिंदास...
सदियों से अपने अन्दर गौरवपूर्ण इतिहास को सहेज कर रखने वाली बिहार की पावन धरती पर मेरा जन्म हुआ। जन्म के समय मुझे सिर्फ़ शायद अपने ही अस्तित्व का ज्ञान रहा होगा। अपने जीवन के पहले पड़ाव में शायद मैं सिर्फ़ एक इंसान था। तब सारा जहाँ मुझे एक सा नज़र आता था। तब शायद मुझे हर इंसान भी एक जैसा ही नज़र आता था। लेकिन, समय के साथ-साथ, जैसे-जैसे मेरी चेतना और समझ बढ़ी, वैसे-वैसे ही मैं सामाजिक तानेबाने में भी उलझता गया। इन सामाजिक तानेबाने में उलझ कर ही मैं जान पाया कि मैं एक हिन्दुस्तानी हूँ। लेकिन, इन तानेबाने में उलझा हुआ उम्र के अलग-अलग पड़ावों पर मैं कब एक आम इंसान और एक हिन्दुस्तानी का चोला छोड़, पहले एक उत्तरभारतीय, फिर हिंदू और फिर एक ब्राह्मण वंशी बन गया, पता ही नही चला। हाँ, इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि तमाम रूपों का चोला बदलने का जो मेरा कड़वा अनुभव रहा, उसे बयां करने की हिम्मत अब मुझमें नही बची है। लेकिन, इन कंटीले अनुभवों ने मुझे हर इंसान और समाज में फर्क करना सिखा दिया। हाँ, इस दौरान ज़िन्दगी के उबड़-खाबड़ रास्तों पर सफर के वक्त मुझे अपने परिवार और चंद दोस्तों का भी भरपूर साथ मिला। बहरहाल,अब पत्रकारिता, भाषा और समाज के विभिन्न पहलुओं को अपने अन्दर समेटे हुए मैं एक बार फिर उस दुनिया में जाना चाहता हूँ जहाँ इंसान और इंसान के बीच का फर्क मिट जाए।
1 comment:
good . congrats for starting real blogging.
Post a Comment